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बैल व्यथा

dapakan.com
October 27th, 2020 · 2 min read

बैल, किसान और बाजार के रिश्तों की पहचान करती यह कविता किसानी की हडप्पाई सभ्यता का प्रतिनिधित्व करती है । वैदिक युग की कृषि सभ्यता का आर्थिक ढाँचा भी यहाँ खोजा जा सकता है । लंबी शोषण परम्परा का वाहक एक बैल भी रहा है । क्या वह किसान का प्रतिनिधि है ? मानबहादुर सिंह हिंदी का भूला दिया गया कवि है । सवर्णवादी हिंदी आलोचना और इतिहासों ने किसान कविता को कभी नोटिस नहीं लिया । मानबहादूर सिंह श्रमजीवी जनता का प्रतिनिधि कवि है लेकिन फिर भी तलुवा-वन्दन की परम्परा से पोषित वर्ग संघर्ष की खाल ओढ़े हिंदी दुनिया की नजर में खेत के संघर्ष कभी नहीं आ सकते थे । यह कविता 1978 ई. में प्रकाशित उनके कविता संग्रह ‘बीड़ी बुझने के करीब’ से ली गई है । -ओमप्रकाश सुंडा

तुम मुझे हरी चुमकार से घेरकर

अपनी व्यवस्था की नाद में

जिस भाषा के भूसे की सानी डाल गये

एक खूँटे से बँधा हुआ

अपनी नाथ को चाटता हुआ

लम्बी पूँछ से पीठ पर

तुम्हारे पैने की चोट झाड़ता हुआ

खा रहा हूँ

देखो हलधर,

मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि

तुम मुझे अपने खेत जोतने को

नान्धते हो

कभी दायें से कभी बाएँ से मुझे हाँकते हो

बहरहाल बड़ा मरकहा सवाल है

क्योंकि मुझे पता है

मेरा बल हर हालत में

तुम्हारी बदनीयती से जुड़ा है

तुम्हारे पास जमीन है

हल है, पैना है और मुझे

तुम्हारे ईंधन के लिए हगना

पाँव के जूते के लिए मरना है

खेत में खाद के लिए

मेरी हड्डियों को पीसना है

मैं कोई फसाद नहीं कर रहा हूँ

हलधर भैया,

सिर्फ अपनी जमात की बात कर रहा हूँ जिनको

विधाता ने सींग भी दिया है

और कंधे में धरती चीथ डालने की कूवत

पर अब इतना तो साफ कहो

तुम मेरी बिरादरी के खिलाफ हो

मेरी गूँगी मेहनत से

तुमने एक भाषा उगाई है

खरी खोटी मोट पातर बोलियाँ मैंने सुनी

कविता तुमने खाई है

इस नाद में तुम्हारे समय का स्वाद

खा रहा हूँ

जिसकी बाहें पगुराता हुआ

अपनी तकलीफों से जवान लड़ रहा हूँ

मुझे खेद है

अब मेरी माँ के थन का दूध

तुम्हारी किशोरी कमोरियों में

फेनाया हुआ तुम्हारे बच्चों की

हँसी में बह रहा था

अपने दूधमुँहे दाँत के नीचे

सूखा तृण दाबे

क्या मैं कुछ कह रहा था ?

मेरी इच्छाओं को बद्धी कर

मेरे हर अंगुल शरीर को

अपनी मुट्ठियों में नापकर

मेरे हर विरोध को नाम दिया था

कितना कमजोर पड़ जाता है

सच का पशुबल भी

फरेब से भाँजी हुई पगही में

मेरी सींग को फुलरे पहिना

अपनी गाडी खिंचवाया

एक ऐसी राजनीति है

जिसे मेरे कंधे समझते हैं

मुझे खबर है तुम्हारी भाषा का

जो तुम्हारी खबरें ढोती हैं -

उस रात अपनी सरिया के अँधेरे में

नीचे पड़े ओछरे को सूँघता

मेरी नाक को छू गया

किसी रंगीन पत्रिका का फटा पन्ना

जिस पर छपा था

बाटा के जूतों का इश्तहार

जिसकी कविता पहनकर तुम्हारा बेटा

रोज जाता है बाजार

मैं किन-किन दूकानों में बिका हूँ

उससे खबरदार होकर भी तो

मैं सरकार नहीं हूँ कि

अपने चमड़े का सिक्का चला दूँ

मैंने बहुत सोचा है

तुम्हारे सूतने के वक्त

खेत के बीच मूतता हुआ

मुँह लगे खोंचा को कि अब

मैं सिर्फ स्मृतियाँ पगुर सकता हूँ

न कुछ नहीं खा सकता

धरती से उगा हर हरा अक्षर

भैंस बराबर लगता है

जहाँ मेरी गैया

मेरे सूखे अंडकोष को निहारती है

जब मेरा श्रम चुकने के बाद

मेरा बुढ़ापा तुम्हारा, जुआ

उठाने के लिए उठा नहीं सकता है

तब कसाई के गंडास के नीचे के

अलावा वह और कही

मर नहीं सकता है

कैसे समझाऊं अपनी बात

मेरी भाषा तुम समझते नहीं

तुम अपनी भाषा मुझे सिखाते हो

तुम आदमी हो इन्सान हो

मनुष्य हो मैं जानवर हूँ

इसलिए मजबूर हूँ कि

तुम्हारा मजदूर हूँ

तुम अक्लमंद हो

हाकिम हुक्काम हो

मैं गर्जमंद हूँ नौकर चाकर हूँ

बेशऊर हूँ

तुम्हारे पास बहुत सारे

आध्यात्मिक दर्द है

जो तुम्हारी निरंकार कविताओं के

पेट में पचते हैं

मेरे पास तो बस एक पैर का दर्द है

जिसके लिए ताउम्र

मेरे कंधे खटते हैं

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