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कृषकों की पहली पीढ़ी का दायित्व

dapakan.com
October 8th, 2020 · 1 min read

पिछले 6 सालों में कॄषक जातियाँ सबसे ज्यादा हिंदूवादी हुई है। उनका इतिहास और अतीत ठीक इसके उलट रहा है। खेत में हाड़-तोड़ मेहनत और शोषण की शिकार इन जातियों की प्रथम साक्षर पीढ़ी ही हिंदुत्ववादी घृणा और भारतीय राजनीति की धार्मिक शोषणकारी व्यवस्था की शिकार हो गई।

जिन लोगों के यहाँ आस्था के नाम पर जीवन के तीन बुनियादी प्रश्न ही मुख्य थे - उन्नत खेती की कामना, अगली पीढ़ी का ब्याह और किसानी का स्वाभिमानपूर्ण जीवन; साक्षर होते ही आज वे हिंदुत्व के सबसे बड़े पैरोकार बने हुए हैं। उनके लिए बाबरी विध्वंस और राम मंदिर निर्माण गर्व का विषय हो गया है जबकि इतिहास और अतीत का कोई बहुत ज्यादा पुराना सम्बन्ध इनसे रहा नहीं।

वैसे भी बाबरी और राम मंदिर राजसत्ता पाने की मुहिम भर थी। जिस आंदोलन से किसान कोम को धेले भर का भी फायदा न हो, इतिहास और वर्तमान से कोई सीधा रिश्ता न हो; उनके बच्चें बेकार में बलि चढ़ जाए इससे बुरी बात क्या हो सकती है ?

सबसे बड़ी जरूरत आज किसान जातियों की इस बात की है कि वे अपने अतीत के पन्नों को पलटें और राजसत्ताओं के दमन और शोषण के इतिहास को सामने लाये ! यह कार्य पहली पीढ़ी के साक्षरों के द्वारा ही सम्पन्न होगा।

उन्हें ज्ञात करना होगा कि किसान कोम की उत्पत्ति से लेकर आज तक इतिहास और साहित्य की किताबों में उनको कितना स्थान मिला है और साथ ही यह भी कि अब तक के राजनीतिक परिदृश्य से उनको बाहर रखने की साजिश किनकी थी? जबकि वो तो भारतीय संस्कृति के ही धार्मिक प्रतीकों को अपनाते आ रहे हैं । उन्होंने तो कोई धर्मद्रोहिता जैसा अपराध नहीं किया ?

आज भी खेतिहर जातियों की जनसंख्या के अनुपात तथा उत्पादन के हिस्से में उनके योगदान के हिसाब से नीति निर्माण में उनका कितना योगदान है ? हिंदुत्व की यह राजनीति कोई पहली बार नहीं हो रही, हजारों वर्षों से पूर्वजों ने खेतों में अपनी हड्डियाँ गलाई है इसी धर्म के चक्कर में… लेकिन धर्म ने क्या दिया ? बस उतना ही भोजन जितना जीने के लिए जरुरी था।

अभी हिंदूत्व नामक राजनीतिक विचार फिर से सदियों लंबी गुलामी में खेतिहर जातियों को धकेलने की जुगत में है। बचा जा सकता है। लेकिन पहली पीढ़ी के साक्षरों को इसके लिए अपने इतिहास और साहित्य को खंगाल कर लाना होगा ताकि गौरव भावना जागृत हो और इस शोषण की चक्की से मुक्ति मिल सके।

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