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किसानी की बर्बादी के सरकारी प्रयास

dapakan.com
September 20th, 2020 · 2 min read

ये तीनों बिल* किसानों की लंबी गुलामी का दस्तावेज हैं। सरकार को फाँसी के फंदे भी तैयार करवाना चाहिए और किसानों में बाँट देना चाहिए।

जो मध्यमवर्ग शहरों में रहता है या छोटे शहरों और गाँवों में रहकर नौकरी कर रहा है उनको अभी यह नहीं पता कि कालाबाजारी को कानूनी मान्यता दे दी गई है।

प्रेमचंद के होरी को याद कर लीजिए। किसान से मजदूर बनकर किस कदर मौत को प्राप्त हुआ था। अब होरी घिस-घिस कर मरने के बजाय आत्महत्या करें तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

कल को किसान की फसल इसलिए खेत या घर पर पड़े-पड़े सड़ जाएगी क्योंकि स्वाभिमानी किसान अपने खून पसीने से उपजाई फसलों को कौड़ियों के भाव बेचने में कत्तई विश्वास न करेगा।

मीडिया को इन बिलों के किसान हितैषी बनाने के काम में लगा दिया है। ये मीडिया उन बाघों की पैरवी कर रहा है जो सदियों से किसानों का शिकार करते आ रहे थे।

कभी सामन्त, कभी जमींदार, कभी साहूकार तो कभी अंग्रेज बनकर…लोकतंत्र की लंबी लड़ाई के बाद मिली आजादी ने किसानों को बहुत ज्यादा तो नहीं दिया लेकिन किसानी अस्मिता समझ जरूर बनी।

किसानों के बच्चें नीति निर्माण करने वाली संस्थाओं की ओर बढ़ सकते हैं। वहाँ जाकर सार्वजनिक फैसलों में खेत और खलिहान की खुशबू डाल सकते हैं। पर ऐसे कानून सदियों पीछे धकेल देते हैं।

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में किसान आंदोलनों ने उनके बच्चों को व्यवस्था के निचले पायदान पर सेवा चाकरी तक तो पहुँचाया पर नीति निर्माण पर जाने की कोशिश करते ही टांग खींच ली। इस टांग खिंचाई में सत्ताओं के भेजे नकली आंदोलनधर्मी क्रांतिकारी भी रहे हैं।

आजादी से आज तक संसद पूँजी की दलाली ही करती रही है। इस दलाली के साधन बनें हैं किसानों और मजदूर के लिए लड़ने वाले अपनी ही कोम के गद्दार नेता !

कांग्रेस पार्टी की सरकार हो या भाजपा या वाम समर्थित सरकारें, चुनाव जीतने तक ही किसानी उनके लिए गौरव का विषय रही। बाद में सब उसी सामंती लूट का हिस्सा बन गए।

कई अक्ल के अंधे कहते फिरते हैं कि किसानों को भी व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाना चाहिए। खाने से लेकर पादने तक में जिन्होंने शास्त्र लगाया हो वे ही ऐसे बचकाने सुझाव दे सकते हैं। भूख आदमी को भिखारी बना देती है। भिखारी 50 लाख की गाड़ी वाले को अपने तबले की मार से नहीं खत्म कर सकता।

आज देश जो स्वाभिमान और राष्ट्र होने के गौरव से भरा है; सूंघीये उसमें किसानों की लाशों की गंध उठ रही है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में बैठे लोग किसानों का खून पीकर इतने मोटे हुए हैं। ये तीनों कानून लूट और शोषण को सरकारी वैधता देने के लिए बनाए गए हैं।

*1. कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन व सुविधा ) अध्यादेश, 2020 ( Farmer’s produce trade and commerce ( promotion and fscilitation ) ordinance )

*2. अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential commodity act, 1955)

*3. The farmer agreement on price assurance and farm services ordinance( मूल्य आश्वासन पर किसान ( बंदोबस्ती व सुरक्षा ) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश, 2020

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