Navigate back to the homepage

वे आँखें

dapakan.com
September 29th, 2020 · 1 min read

अंधकार की गुहा सरीखी उन आँखों से डरता है मन, भरा दूर तक उनमें दारुण दैन्य दुःख का नीरव रोदन

अह, अथाह निराश्य, विवशता का उनमें भीषण सूनापन मानव के पाश्व पीडन का देती हैं वे निर्मम विज्ञापन

फूट रहा उनमें गहरा आतंक क्षोभ, शोषण, संशय, भ्रम
डूब कालिमा में उनकी काँपता है मन, उनमें मरघट का तम

ग्रस लेती दर्शक को वह दुर्जेय दया की भूखी चितवन झूल रहा है उस छाया पट में युग-युग का जर्जर जीवन

वह स्वाधीन किसान रहा अभिमान भरा आँखों में इसका छोड़ उसे मझदार आज संसार कगार सदृश बह खिसका

लहराते वे खेत दृगों में हुआ बेदखल अब जिनसे हँसती थी उसके जीवन की हरियाली जिनके तृन-तृन से

आँखों ही आँखों में घूमा करता वह उसकी आँखों का तारा कारकुनों की लाठी से जो गया जवानी ही में मारा

बिका दिया घर द्वार महाजन ने न ब्याज की कोड़ी छोड़ी रह-रह आँखों में चुभती वह कुर्क हुई बरधों की जोड़ी

उजरी उसके सिवा किसे कब पास दुहाने आने देती ? अह, आँखों में नाचा करती उजड़ गई जो सुख की खेती

बिना दवा दर्पन के घरनी स्वर्ग चली, - आँखे आती भर देख रेख के बिना दूधमुँही बिटियाँ दो दिन बाद गई मर

घर में विधवा रही पतोहू लक्ष्मी थी यद्धपि पति-घातिन पकड़ मँगाया कोतवाल ने डूब कुएँ में मरी एक दिन

ख़ैर पैर की जूती जोरू न सही एक दूसरी आती पर जवान लड़के की सुध कर साँप लोटते, फटती छाती

पिछले दुःख की स्मृति आँखों में क्षण भर एक चमक है लाती तुरत शून्य में गढ़ वह चितवन तीखी नोक सदृश बन जाती

मानव की चेतना न ममता रहती तब आँखों में उस क्षण ! हर्ष शोक अपमान ग्लानि दुःख दैन्य न जीवन का आकर्षण !

उस अवचेतन क्षण में मानो वे सुदूर करती अवलोकन ज्योति तमस के परदों पर युग जीवन के पट का परिवर्तन

अंधकार की अतल गुहा सी अह, उन आँखों से डरता है मन, वर्ग सभ्यता के मन्दिर के निचले तन की वे वातायन !

__

सुमित्रानंदन पन्त हिंदी के छायावादी कवि थे__

More articles from Dapakan

किसानी की बर्बादी के सरकारी प्रयास

अब होरी घिस-घिस कर मरने के बजाय आत्महत्या करें तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में बैठे लोग किसानों का खून पीकर इतने मोटे हुए हैं।

September 20th, 2020 · 2 min read

बैल व्यथा

मानबहादुर सिंह हिंदी का भूला दिया गया कवि है. सवर्णवादी हिंदी आलोचना और इतिहासों ने किसान कविता को कभी नोटिस नहीं लिया. मानबहादूर सिंह श्रमजीवी जनता का प्रतिनिधि कवि है

October 27th, 2020 · 2 min read
© 2019–2020 Dapakan
Link to $https://twitter.com/